बुधवार, 24 मई 2017

तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा.



ओ कल्पवृक्ष की सोनजुही!
ओ  अमलताश  की  अमलकली
धरती  के  आतप  से  जलते
मन  पर  छाई  निर्मल  बदली.
मैं  तुमको  मधुसदगन्ध  युक्त  संसार  नहीं  दे  पाऊँगा
तुम  मुझको  करना  माफ  तुम्हे  मैं  प्यार  नहीं  दे  पाऊँगा
तुम  कल्पव्रक्ष  का  फूल  और
मैं  धरती  का  अदना  गायक
तुम  जीवन  के  उपभोग  योग्य
मैं  नहीं  स्वयं  अपने  लायक
तुम  नहीं  अधूरी  गजल  शुभे
तुम  शाम  गान  सी  पावन  हो
हिम  शिखरों  पर  सहसा  कौंधी
बिजुरी  सी  तुम  मनभावन  हो.
इसलिये  व्यर्थ  शब्दों  वाला  व्यापार  नहीं  दे  पाऊँगा
तुम  मुझको  करना  माफ  तुम्हे  मैं  प्यार  नहीं  दे  पाऊँगा.


मंगलवार, 23 मई 2017

गलती मेरी कल्पना की है या मेरी कविताओं की !!!





बात  बस  हमारी  कविताओं  की  इतनी  सी  है,

अब  मैं  तुमको  कैसे  बताऊँ  की  मेरी  सारी  कविताएं  बस  तुम  से  हैं  और  बस  तुम्हारे  लिये  और  तुम  ही  मेरी  कल्पना  हो,

और  मेरी  कल्पना  तुम  हो  ही  इतनी  ख़ूबसूरत  है  की  मैं  कविताओं  में  नहीं  बस  अपनी  कल्पना  में  ही   खोया  रहता  हूँ,

और  तुम   खुद  एक  जीती-जागती  कविता  हो ,  भला  मैं  तुम   पर  क्या  कविता  लिख  पाउँगा,


तुम्हारी   मुस्कराहट  खुद  एक  कविता  है,  किसी  झरने  की  तरह  बहती,  मन  में  हलचल  मचाती,  तन  को  शीतल  करती,
तुम्हारी   मुस्कराहट  कविता  की  पंक्तियों  की  तरह  खूबसूरत,  सीधा  दिल  की  गहराईयों  में  उतर  जाने    वाली,
अपनी  सुध  नहीं  रहती  जब  तुम्हे   मुस्कुराता  देखते  हैं,

तुम्हारी  आँखें  खूबसूरत  ग़ज़ल  सी,  जिनमें  नज़ाकत  है,  हया  है,  फ़िज़ा  है,  नशा  है,
मदहोश  कर  देने  वाली  तुम्हारी   वो  नजरें,
 ना  किसी  साक़ी  की  ज़रूरत  है  ना  मैख़ाने  की
ना  जाम  की  ना  पैमाने  की ............

जब  भी  देखती  है  हमारी  तरफ  मदहोशी  सी  अपने  आप  छाने  लग  जाती  है,  एक   अज़ब  सा  नशा  सारे बदन  में  उतरने  लगता  है,
सुरूर  सा  छा  जाता  है,  दिल  झूमने  लगता  है  और  मन  का  गीत  हमारा  ग़ज़ल  गाने  लगता  है,

होंठ  तुम्हारे  किसी  खूबसूरत  शायरी  की  तरह  दो  शब्द  भी  बोल  दें  तो  हमें  मतलब  समझने  में  भी बरसों  लग  जायें,
बोलते  हैं  तो  फिर  भी  ठीक  हैं  पर  कभी-कभी  बिना  बोले  भी  बहुत  कुछ  बोल  जाते  हैं  तो  उसको समझने  में  बड़ी  तकलीफ  होती  है।

बेहद  खूबसूरत  दो  लफ़्ज़ों  की  शायरी  और  उससे  भी  कहीं  ज्यादा  खूबसूरत  उनके  दो  प्यारे  से  सुर्ख गुलाबी  होंठ !!!

जितना  कुछ  भी  मैंने  अभी  लिखा  ये  सब  तो  कुछ  भी  नहीं,  तुम्हारा   इतराना,  तुम्हारा  बलखाना, तुम्हारा  हसना,   तुम्हारा   बोलना,  तुम्हारा  देखना,  तुम्हारा  मुस्कुराना,

तुम्हारी   हर  एक  अदा  पर  हर  एक  शोख़ी  पर  ना  जाने  कितनी  कविताएं,  ना  जाने  कितनी  ग़ज़ल  मैं लिख  भी  दूँ ,  तब  भी  मुझे  हमेशा  यही  लगता  है  और  लगता  रहेगा   की  तुम्हारी   खूबसूरती  बहुत  ज्यादा  है  और  मेरे  पास  उसे  बयां  करने  के  लिए  शब्द  बहुत  कम।

ख़ामोशी  को  जुबाँ  देने  के  लिए  हमारे  पास  बस  हमारी  कलम  ही तो  है जब  जब  उनको  देखता  हूँ  हर बार  ऐसा  लगता  है  जैसे  मैं  उन्हें  पहली  बार  देख  रहा  हूँ,

पता  नहीं  यहाँ  पर  गलती  मेरी  कल्पना  की  है  या  मेरी  कविताओं  की .....................



शनिवार, 20 मई 2017

आँखों से हमारी गायब है नींदें !!!



आँखों  से  हमारी  गायब  है  नींदें
हर  ख्वाब  हमको  सुनहरा  नज़र  आता  है


पलकें  हमारी  झपके  भी  तो  कैसे
हर  वक़्त  सामने  उनका  चेहरा  नज़र  आता  है

बेबसी  और  बैचेनी  तड़पाती  है  दिल  को
चुप-चुप  अश्कों  को  पीना  नज़र  आता  है

छलनी-छलनी  हो  गया  पागल  दिल  हमारा
अब  तो  मुश्किल  जख्मों  को  पीना  नज़र  आता  है

वो  जान  कर  भी  अनजान  बने  बैठे  हैं
हमको  भी  अजनबी  बन  जीना  नजर  आता  है।

शुक्रवार, 19 मई 2017

"कल्पना" हो अगर !!!








ये  कहानी  अधूरी  तो  ना  छोड़ो  तुम
हमसे  ऐसे  नज़र  को  तो  ना  मोड़ो  तुम
दिल  तो  दिल  हमारा  पत्थर  तो  नहीं
ऐसे  शीशा  समझ  के  तो  ना  तोड़ो  तुम,

खुशी  मिल  गयी  जब  से  तुम  हो  मिले
रंगीन  है  समा  जबसे  तुम  हो  मिले
है  छायी  ख़ुमारी  हर  एक  शाम  पर
एक  नशा  छा  गया  जबसे  तुम  हो  मिले

नदिया  हो  अगर  मैं  कोई  प्यास  हूँ
मुझको  महसूस  कर  मैं  तेरे  प्यास  हूँ
गीत  हो  या  ग़ज़ल  या  हो  कविता  कोई
"कल्पना"  हो  अगर  मैं  कोई  ख़्वाब  हूँ।

गुरुवार, 18 मई 2017

कुछ ख़ास - आपके लिए !!!



आँख  जब  उनसे  मिली  अपना  होश-ओ-हवास  खो  दिया
नींद  खोयी  रातों  की  दिन  का  चैन  खो  दिया
अब  तो  कुछ  बचा  नहीं  मेरे  पास  खोने  को
पहले  तो  दिल  खोया  आज  अपने  आप  को  भी  खो  दिया।

जरुरी  है  की  आँखों  में  मिलने  की  प्यास  बाकि  रहे
ताकि  ज़िंदगी  में  ज़िंदा  होने  का  एहसास  बाकि  रहे
फैसले  सारे  तेरे  हसकर  कबूल  है  ऐ  ज़िंदगी
बस  दिल  में  किसी  के  लिए  प्यार  और  धड़कन  में  इंतज़ार  बाकि  रहे।

मत  छेड़ा  करो  पुराने  तारों  को  हमारे
सीने  का  दर्द  आँखों  में  गलने  लगता  है
लाख  बहारें  छायी  हो  भरे  गुलशन  में  लेकिन
पतझर  आते  ही  मौसम  बदलने  लगता  है।

जो  खुद    है  फूल   कुमुदनी  का  उसे  मैं  कमल  क्या  लिखूँ
जो  खुद  है  जीती-जागती  ग़ज़ल  उसे  मैं  ग़ज़ल  क्या  लिखूँ।

मंगलवार, 16 मई 2017

उनकी एक झलक को !!!!







" मनु "  वो  खूबसूरत  बसंती  हवा  सी
अपने  आँचल  में  सारे  गुलशन  को  समेटे  हुए
पीली-पीली  सरसों  की  तरह  लहराती-बलखाती
जब  भी  गुजरती  है  हमारे  आस-पास  से  अक्सर
ऐसा  लगता  है  जैसे  मौसम  बसंत  का  भी 
शर्मा  जाता  होगा
जब  देखता  होगा  उनकी  एक  झलक  को,


" मनु "  वो  मादकता  आंखों  से  छलकाती
हुस्न  की  शोखियों  पर  साकी  जैसे  बलखाती
वो  सरस-सजल  पलकों  वाली,  वो  कुंचित  घन  अलकों  वाली
जब  भी  गुजरती  है  हमारे  आस-पास  से  अक्सर
ऐसा  लगता  है  जैसे  पैमानें  और  मैख़ाने  भी
शर्मा  जाते  होंगे
जब  देखते  होंगे  उनकी  एक  झलक  को,


" मनु "  वो  लहराता  ख़ूबसूरती  का  साग़र
एक  मुस्कराहट  उनकी  दूर  तक  हल-चल  मचाती
भीगे-भीगे  अधर  उनके  गुलाब  की  पंखुड़ी  की  तरह  सरस
 जब  भी  गुजरती  है  हमारे  आस-पास  से  अक्सर
ऐसा  लगता  है  जैसे  क़लम  हमारी
दीवानी  हो  जाती  है
जब  देखती  है उनकी  एक  झलक  को ।


शनिवार, 13 मई 2017

" हर कविता मेरी बस तुम्हारे लिए "








कुछ  खास  है  कुछ  खोये  एहसास
कुछ  यादों  के  हैं  धोये  एहसास
एहसासों  को  पल-पल  संजोते  हुए
सजाकर  लाया  हूँ  तुम्हारे  लिए
ये  कविता  मेरी  है  तुम्हारे  लिए,

कुछ  हकीकत  हैं,  अफ़साने  हैं
कुछ  नग्में  हैं  कुछ  तराने  हैं
कल्पनाओं  को  पल  में  समेटे  हुए
सजाकर  लाया  हूँ  तुम्हारे  लिए
ये  कविता  मेरी  है  तुम्हारे  लिए,

कुछ  बातें  कही  हैं  कुछ  अनकही
कुछ  रस्में  नयी  कुछ  कस्में  नयी
तन्हाई  को  खुद  में  समेटे  हुए
सजाकर  लाया  हूँ  तुम्हारे  लिए
ये  कविता  मेरी  है  तुम्हारे  लिए,

कुछ  दर्द  सहे  कुछ  पीड़ा  सही
बेचैनी  सही  लाचारी  सही
अश्कों  से  दामन  भिगोए  हुए
सजाकर  लाया  हूँ  तुम्हारे  लिए
ये  कविता  मेरी  है  तुम्हारे  लिए,

मिलो  तुम  हमें  पलकों  के  तले
समय  से  इधर  या  समय  से  परे
कुछ  सपने  आँखों  में  संजोये  हुए
 सजाकर  लाया  हूँ  तुम्हारे  लिए
ये  कविता  मेरी  है  तुम्हारे  लिए।


'' तुम्हारे  लिए  बस  तुम्हारे  लिए
हर  कविता  मेरी  बस  तुम्हारे  लिए "


" आँखें  तो  कह  देती  हैं  बस  होटों  से  दूरी  है,
कुछ  कहना  चाहता  हूँ  तुमसे  पर  जाने  क्या  मज़बूरी  है "






गुरुवार, 4 मई 2017

वफ़ा ना कर बैठे !!!




ख़्वाब - ओ - हकीकत  में  फासला  ना  कर  बैठे
पलकें  हमारी  झपक  कर  ये  गुनाह  ना  कर  बैठें
हम  तो  समझाते  रहते  हैं  अपने  दिल  को  बहुत
उनकी  नजरों  से  उलझ  कर  वफ़ा  ना  कर  बैठे।

सोमवार, 1 मई 2017

रहते हैं जाने कहाँ पर वो - ग़ज़ल








रहते  हैं  जाने  कहाँ  पर  वो  आज  कल
एक  हम  ही  हैं  जिसको  ख़बर   नहीं  मिलती

तड़प-२  कर  कट  रहा  लम्हा  इंतज़ार  का
इंतज़ार  के  इस  लम्हे  को  उम्र  नहीं  मिलती

सामने  जब  आते  हैं   हमारे  वो  कभी-कभी
आँखें  उठती  है  पर  नज़रों  से  नज़र  नहीं  मिलती

मोहोबत  का  नूर  है  उनके  चेहरे   पर  भी
ख्वाबों  को  बस  इतनी  हक़ीक़त  नहीं  मिलती ।।



शनिवार, 29 अप्रैल 2017

कहीं तो अधूरी जिंदगानी रह जाएगी !!!


प्यार  के  बिना  भी
उम्र  काट  लेंगे  आप  किन्तु
कहीं  तो  अधूरी  जिंदगानी  रह  जाएगी,

यानि  रह  जाएगी  ना  मन  में  तरंग
नाही  देह  पर  नेह  की  निशानी  रह  जाएगी,

रह  जाएगी  तो  बस  नाम  की
नहीं  तो  फिर  किस  काम
ये  जवानी  रह  जाएगी,

रंग  जो  ढंग  से
उमंग  के  चढ़ेंगे  तो,

कबीर  सी  चदरिया  पुरानी   रह  जाएगी।


कवि वर - स्वर्गीय श्री देवल आशीष

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दिल की बातें समझती नहीं हो !!!









कितनी  मासूम  हो  तुम  हो  जानम
दिल  की  बातें  समझती  नहीं  हो
मैं  तो  हूँ  तेरे  प्यार  में  पागल
तुम  हो  पगली  समझती  नहीं  हो,


जबसे  तुम  हो  मुझे  मिल  गयी
सूने  मन  में  कली  खिल  गयी
मैं  सागर  था  बरसों  से  तन्हा
उसको  नदिया  सी  तुम  मिल  गयी,

अब  होने  दो  प्रेम  का  संगम
देर  जाने  क्यों  अब  कर  रही  हो

तुम  हो  पगली  समझती  नहीं  हो,

रात  की  चांदनी  के  तले
आस  का  एक  दीपक  जले
आँख  के  मोतियों  सा  छलक  कर
पलकों  पर  एक  सपना  पले,

देखो  बेचैन  मैं  हो  रहा  हूँ
तुम  भी  करवट  बदल  तो  रही  हो
तुम  हो  पगली  समझती  नहीं  हो।




रविवार, 23 अप्रैल 2017

प्यार की नयी शुरुआत !!!






अनजाने  से  हम  भी  अनजाने  से  तुम  भी
अनजाने  हैं  मंजिल  अनजानी  डगर  भी,
चलो  मिलकर  सफर  में  साथ-साथ  चलते  हैं
प्यार  की  हम  नयी  एक  शुरुआत  करते  हैं।






गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

उनकी सांसों की खुश्बू !!!




दिल  के  अरमानों  ने  मेरे
फिर  से  ली  अंगड़ाई  है,
उनकी  सांसों  की  खुश्बू  लेकर
लौटी  फिर  पुरवाई  है,

एहसास  नए  से  जागे  हैं
जब-जब  उनको  महसूस  किया,
 मदहोशी  में  अक्सर  मैं
उनकी  यादों  में  झूम  लिया,

अब  सुबह  नई  और  शाम  नई
मेरे  जीवन  में  आयी  हैं,
दिल  के  अरमानों  ने  मेरे
फिर  से  ली  अंगड़ाई  है,

उलझ  रहा  था  जीवन  की
प्यासी - पथरीली  राहों  पर,
व्यर्थ  विषय  की  बातों  पर
और  अपनों  के  आघातों  पर,


अब  भटके  एक  पथिक  ने  जैसे
फिर  से  मंजिल  पायी  है,
दिल  के  अरमानों  ने  मेरे
फिर  से  ली  अंगड़ाई  है,


उनकी  सांसों  की  खुश्बू  लेकर
लौटी  फिर  पुरवाई  है ।